आजाद भारत का सबसे वीर योद्धा: अकेले मार गिराए थे चीन के 300 सैनिक, 72 घंटे तक की थी लड़ाई

1962 में 17 नवंबर के दिन चीनी सेना ने अरुणाचल प्रदेश पर हमला कर दिया था और वह अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करना चाहता था. जब indo-china वॉर हुई थी तो चीन के लक्ष्य के बीच दीवार बनकर खड़े हुए थे गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन के राइफलमैन जसवंत सिंह रावत. जसवंत सिंह रावत 17 नवंबर से 72 घंटे तक बहादुरी से चीनी सेना के साथ लड़ते रहे और उन्होंने अदम्य साहस का प्रदर्शन किया.

जसवंत सिंह रावत महज 17 साल की उम्र में ही भारतीय सेना में भर्ती होने के लिए चले गए थे. लेकिन उम्र कम होने की वजह से वह भारतीय सेना में शामिल नहीं हो पाए. जब वह उनकी उम्र पूरी हो गई तो उन्हें भारतीय सेना में राइफलमैन के पद पर नियुक्त किया गया. 17 नवंबर 1962 को चीन के खिलाफ युद्ध में वह वीरगति को प्राप्त हुए.

17 नवंबर 1962 को अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने के लिए चीनी सैनिकों ने चौथी और आखरी बार हमला किया. लेकिन उस समय भारत की तरफ से पोस्ट पर केवल 3 जवान मौजूद थे. एक रायफल थी. ना कोई मशीनें, ना वाहन और ना ही हथियार थे.

72 घंटे तक अकेले लड़ते रहे और 300 चीनी सैनिकों को मार गिराया

यशवंत ने उस समय अदम्य साहस का प्रदर्शन किया. उन्होंने लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी और राइफलमैन गोपाल सिंह गुसाईं को वापस भेज दिया और खुद 72 घंटे तक अकेले लड़ते रहे और उन्होंने 300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और किसी को आगे बढ़ने नहीं दिया. उन्होंने अपनी सूझबूझ से काम लिया. उन्होंने पोस्ट की अलग-अलग जगह पर रायफल तैनात कर दी थी और कुछ इस तरह से फायरिंग कर रहे थे जिससे चीन की सेना को लग रहा था कि यहां पूरी बटालियन मौजूद है.

जसवंत सिंह रावत ने 17 नवंबर 1962 को खुद को गोली मार ली और अपने प्राण न्योछावर कर दिए. लेकिन वह दुश्मनों के हाथ नहीं आए. जब चीनी सैनिकों ने देखा कि 3 दिन से एक सिपाही उनके साथ लड़ा था तो वह भी हैरान रह गए थे. चीनी सैनिक जसवंत सिंह रावत का सर काट करके ले गए. 20 नवंबर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा हुई. बता दें कि चीनी कमांडर ने जसवंत की बहादुरी को देखते हुए उनका शीश वापस लौटाया. साथ ही सम्मान स्वरूप एक कांस की बनी हुई जसवंत सिंह की मूर्ति भी भेंट की.

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